शक्ति चेतना उत्सव* *दिव्य साधना से उत्पन्न अमृत तत्त्व को बांटने का महोत्सव*

चंडीगढ़/हिमाचल (मिडिया जंक्शन/चेतन शर्मा/हरीश):+
12 जनवरी 1941 को देवधरा भारतवर्ष में अवतरित, ब्रह्मांड की संपूर्ण महासिद्धियां प्राप्त परमसिद्ध महायोगी, अध्यात्म की अनंत आकाशगंगाओं के उद्भेदक, दिव्य अलौकिक शक्तियों से संपन्न, त्रिकालद्रष्टा युगमहापुरुष छह वर्षों के अंतराल के बाद चंडीगढ़ में पधार कर समस्त श्रद्धालु भक्तजनों एवं जनता जनार्दन को दिव्य साधनोत्पन्न अमृततत्त्व का अनुभव प्रदान कर निहाल करेंगे।
गत दिवस विश्वधर्म चेतना मंच, तिरुपति के राष्ट्रीय संयोजक श्री भूपेंद्र जैन, हिमाचल प्रदेश विश्वधर्म चेतना मंच के अध्यक्ष श्री रोशन लाल जैन, श्री भाग सिंह दमदमा, श्री सत्यम गुप्ता जी एवं चंडीगढ़ से गुरुभक्त श्री प्रवीण गुप्ता जी के संग, शक्ति चेतना उत्सव निमंत्रण श्रृंखला के अंतर्गत शिमला पधारे। जहां उन्होंने हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं अन्य उच्च अधिकारियों को उत्सव में पधारने का निमंत्रण दिया।
उल्लेखनीय है कि वेद-वेदांग, शास्त्र, उपनिषद्, ज्योतिष, आगम-निगम, पुरातन गूढ़ योगविद्याओं के ज्ञाता गुरुदेव जी को 12 वर्ष की आयु में चारों वेद, पुराण, रामायण, गीता, उपनिषदों एवं संसार के समस्त 72 धर्मों के धर्मग्रंथों का का वृहद् ज्ञान हो चुका था।
शिक्षा सेवा और साधना; सबसे बड़ा धर्म–जीव मानव सेवा व सबका कल्याण; सबसे बड़ी पूजा संयमित जीवन, सब जीवों पर दया; अंतर में अहिंसा, जीवन में आत्मदर्शन हो, प्रदर्शन नहीं; धर्म जाग्रत हो, सुषुप्त नहीं; जीवन में भागो मत, जागो और तब तक चलते रहो जब तक मंजिल न मिल जाये; स्वयं ऊपर उठो एवं औरों के जीवन को उठाने में प्रेरक एवं सहयोगी बनो– इन अमृत सूत्रों को अपनाकर, जीवन को सफल एवं धन्य बनाने का उपदेश देने वाले, विश्ववंद्य शिवस्वरूप सिद्धेश्वर सिद्धगुरु ब्रह्मर्षि गुर्वानंद स्वामी जी गुरुदेव सात सर्वधर्म विश्व सम्मेलनों में सातों बार स्वर्ण पदक से विभूषित, सन् 1974 में जर्मन ज्योतिष काउंसिल द्वारा ज्योतिष मर्मज्ञ से सम्मानित एवम् विश्व के विभिन्न देशों में आयोजित अन्य धर्म महासम्मेलनों में 27 बार स्वर्णपदकों से समलंकृत हो चुके हैं।
गुरुदेव उस ‘विश्वधर्म चेतना मंच’ नामक संस्था के संस्थापक हैं, जो निरंतर राष्ट्र उन्नयन, मानव सेवा एवं विश्व कल्याण कार्यों में जुटी हुई है। श्रद्धेय सिद्धगुरुवर अहर्निश मानव कल्याण कार्यों एवं साधना में रत रहते हैं।
सत्य, प्रेम, दया, करुणा, अहिंसा, शांति, संयम, विनम्रता, सरलता, पवित्रता, सौम्यता, तपश्चर्या एवम् त्याग के मूर्तिमानपुंज गुरु भगवन्
विश्व के लगभग 192 देशों की धर्मयात्राएं कर भारतीय सनातन संस्कृति का ध्वज फहरा चुके हैं।
उनके मुखारविंद से निकली दिव्यामृतवाणी मन के समस्त उत्तापों को हरकर आत्मा के सच्चिदानंद स्रोत को खोल देती है।
आप जी के अगणित गुण-पुष्पों से सुरभित जीवन दर्शन के विराट व्यक्तित्व का स्निग्ध सान्निध्य पाकर अशांत एवं क्लांत मानव परम शांति व आनन्द पाता है।
आपने सर्व जीव जगत कल्याणकारी विश्वधर्म चेतना मंच के माध्यम से सच्चे मानव धर्म की क्रांति का सिंहनाद कर रूढ़िवाद, जातीयता, सांप्रदायिक वैमनस्य की कठोर लौह-श्रृंखलाओं को तोड़कर व्यावहारिक जीवन में वास्तविक धर्म के मर्म एवं दर्शन को प्रतिष्ठापित किया है।
*शूल जहां बिखरे मिले, उन्हें हटाते आप।*
*छू तुमको शीतल हुआ, इस धरती का ताप।*

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