पंचकूला ( मीडिया जंक्शन-/ विक्रांत):-श्री बांके बिहारी ट्रस्ट द्वारा आयोजित काली माता मंदिर सेक्टर 20 में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर कथा व्यास पूज्य श्री श्री 1008 श्री महामंडलेश्वर स्वामी विश्वामित्रानंद गिरि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को अपने ओजस्वी एवं मधुर वचनों से भावविभोर कर दिया। श्रीमद्भागवत के सिद्धांतों को अपनाए, तो परिवार, समाज और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन संभव है आगे वर्णन करते हुए। बताया हिरण्याक्ष वध (वराह अवतार)
हिरण्याक्ष एक अत्यंत बलशाली असुर था, जो दिति और कश्यप ऋषि का पुत्र था। उसने घोर तप करके वरदान प्राप्त किया और अत्याचार करने लगा। अपने अभिमान में उसने पृथ्वी (भूदेवी) को पाताल लोक में ले जाकर समुद्र में छिपा दिया।
तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण किया। उन्होंने विशाल वराह (सूअर) का रूप लेकर समुद्र में प्रवेश किया, पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाया और हिरण्याक्ष का वध कर धर्म की पुनः स्थापना की।
आगे महाराज जी ने वर्णन किया सती का प्रसंग (दक्ष यज्ञ)
सती राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं। राजा दक्ष को भगवान शिव से द्वेष था। उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें जानबूझकर शिवजी को आमंत्रित नहीं किया।
सती बिना बुलाए यज्ञ में पहुँचीं, जहाँ उनके पति भगवान शिव का अपमान हुआ। यह अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने यज्ञ कुंड में आत्माहुति दे दी।
जब यह समाचार भगवान शिव को मिला, तो उन्होंने क्रोधित होकर वीरभद्र को उत्पन्न किया, जिसने दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया।संदेश यह था कि पति-पत्नी का सम्मान, अहंकार का त्याग और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का महत्व इस कथा से स्पष्ट होता है। आगे भागवत कथा को बढ़ाते हुए वर्णन किया भक्त प्रह्लाद की कथा
प्रह्लाद हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु का पुत्र था। हिरण्यकशिपु ने तप करके वरदान पाया और स्वयं को ईश्वर मानने लगा। उसने आदेश दिया कि सब लोग उसी की पूजा करें।
किन्तु प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने अपने पिता के आदेश को नहीं माना। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक यातनाएँ दीं—साँपों के बीच डालना, पर्वत से गिराना, आग में बैठाना—परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ।
अंत में भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर खंभे से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध किया और अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।
अहंकार का अंत निश्चित है। कार्यक्रम में क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक, मातृशक्ति एवं युवा वर्ग की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए उत्तम व्यवस्थाएं की गईं। कथा का समापन महाआरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।
आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं से आगामी दिवसों में भी अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कथा का लाभ लेने का आग्रह किया।
श्रीमद् भागवत कथा का तृतीय दिवस अहंकार का अंत निश्चित है।
