शिव भक्ति से मनुष्य के जीवन में आती है शांति, सदाचार और आत्मिक आनंद : स्वामी डा रमनीक कृष्ण जी महाराज

मोहाली(मीडिया जंक्शन-/ विक्रांत शर्मा):-श्रावण मास के पावन अवसर पर श्री सनातन धर्म शिव मंदिर फेस-9, मोहाली में आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा के विश्राम दिवस में सद्भावना दूत पुराणाचार्य स्वामी डा रमनीक कृष्ण जी महाराज ने शिव भक्ति के माहात्म्य का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान शिव आशुतोष हैं और सच्चे हृदय से की गई भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान शिव की आराधना केवल बाहरी पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि शिव भक्ति का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अंतःकरण को पवित्र करना और उसके जीवन में सत्य, करुणा, संयम, सेवा तथा सदाचार का संचार करना है।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि शिवमहापुराण में भगवान शिव की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। भगवान शिव को देवाधिदेव महादेव, आशुतोष, भोलेनाथ और करुणासागर कहा गया है। वे भक्त के धन, वैभव और बाहरी दिखावे को नहीं, बल्कि उसके भाव और श्रद्धा को देखते हैं। श्रद्धापूर्वक भगवान शिव का स्मरण, शिवलिंग का पूजन, जलाभिषेक, बेलपत्र अर्पण तथा “ॐ नमः शिवाय” का जाप मनुष्य के भीतर आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने वाले साधन हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव का पंचाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय” केवल मंत्र नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण का भाव है। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर भगवान के चरणों में स्वयं को समर्पित करता है, तब उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन प्रारंभ होता है। शिव भक्ति मनुष्य को विकारों से दूर कर धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
स्वामी जी ने कहा कि भगवान शिव का स्वरूप स्वयं में एक महान संदेश है। मस्तक पर चंद्रमा शीतलता का, जटाओं में विराजमान मां गंगा पवित्रता का, नीलकंठ स्वरूप त्याग और लोककल्याण का तथा शरीर पर भस्म वैराग्य का संदेश देता है। भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को अपने कंठ में धारण करके समस्त सृष्टि की रक्षा की। इससे हमें शिक्षा मिलती है कि सच्चा भक्त वही है जो अपने जीवन में दूसरों के कल्याण और सेवा की भावना रखता है।
उन्होंने कहा कि आज मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हुए मानसिक शांति खोता जा रहा है। ऐसे समय में शिव भक्ति जीवन को संतुलित करने का मार्ग दिखाती है। शिवजी का ध्यान, शिव नाम का स्मरण और सत्संग मनुष्य के मन को शांति प्रदान करता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे प्रतिदिन कुछ समय भगवान शिव के नाम-स्मरण, पूजा और ध्यान के लिए अवश्य निकालें।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि सच्ची शिव भक्ति का प्रमाण मंदिर में पूजा करने के साथ-साथ हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। यदि हृदय में शिव हैं तो वाणी में मधुरता, व्यवहार में विनम्रता, जीवन में संयम और दूसरों के प्रति करुणा होनी चाहिए। जरूरतमंद की सेवा करना, दुखी व्यक्ति का सहारा बनना और प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम रखना भी शिव आराधना का ही एक स्वरूप है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को शिवमहापुराण कथा के संदेश को अपने जीवन में धारण करने का संकल्प करवाते हुए कहा कि कथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन को बदलने का माध्यम है। कथा श्रवण तभी सफल है जब उसके द्वारा मनुष्य के विचार, संस्कार और आचरण में परिवर्तन आए।
इस अवसर पर मंदिर कमेटी के पदाधिकारियों, कथा आयोजकों एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा के विश्राम दिवस पर श्रद्धालुओं ने भावपूर्वक शिवमहापुराण का श्रवण किया और भगवान भोलेनाथ के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा।
अंत में स्वामी डा रमनीक कृष्ण जी महाराज ने सभी श्रद्धालुओं को श्रावण मास की शुभकामनाएं देते हुए भगवान भोलेनाथ से सभी के जीवन में सुख, शांति, सद्भावना एवं मंगल की कामना की।
कथा में विशेष रूप से चेयरमैन मंदिर कमेटी रमेश वर्मा, प्रधान जितेंद्र गोयल एवम समस्त सभासद उपस्थित रहे।

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